Print Icon पूर्वी क्षेत्र

सामान्य सूचना

क्षेत्रफल : 4,38,000 वर्ग कि.मी.
राज्य : बिहार, झारखंड, ओडिशा, प.बंगाल, सिक्किम एवं छत्तीसगढ़ का कुछ भाग
मुख्यालय : जमशेदपुर
पता : क्षेत्रीय अन्वेषण एवं अनुसंधान केंद्र, ए.एम.डी. कांप्लेक्स, खासमहल, पो.टाटानगर, ज़िला पूर्वी सिंहभूम, झारखंड - 831 002
संपर्क सूत्र : अनिर्बन  साहा, क्षेत्रीय निदेशक
फोन : 0657-2299807 
फैक्स : 0657-2297689
ई-मेल : rder.amd@gov.in

पूर्वी क्षेत्र की स्थापना सन् 1959 में कोलकाता में की गई । तत्पश्चात 1994 में पूर्वी क्षेत्र का मुख्यालय जमशेदपुर के निजी परिसर में स्थानांतरित किया गया। यूरेनियम अन्वेषण के लिए सिंहभूम अपरूपण अंचल एक प्रमुख क्षेत्र रहा है I देश का प्रथम यूरेनियम भंडार सन् 1951 में जादूगुड़ा में स्थापित किया गया I तत्पश्चात, यूरेनियम के अन्य भंडार नामतः भाटिन, नरवापहाड़, तुरामडीह, बागजाता, माहुलडीह आदि स्थापित किए गए ।

मुख्य भूवैज्ञानिक विशेषताएं

पूर्वी क्षेत्र के बड़े भाग में निम्नलिखित भूवैज्ञानिक प्रक्षेत्र (डोमेन) हैं:

(i) आद्यमहाकल्पी (आर्कियन) आधार नाइस, प्राग्जीव (प्रोटीरोजोइक) तथा अन्य अवसादमुख्यतः झारखंड, ओडिशा एवं प. बंगाल में विस्तारित हैं । भारत के प्राचीनतम शैल - चम्पुआ नाइस (3800 Ma), इसी भूवैज्ञानिक प्रक्षेत्र में हैं। आद्यमहाकल्पी आधार के ऊपर झारखंड एवं ओडिशा के लौह अयस्क वर्ग (I.O.G.) के शैलों का आवरण है।

(ii) प्राग्जीव (प्रोटीरोजोइक) अवसाद एवं ग्रेनिट

सिंहभूम अपरूपण अंचल - निम्न प्राग्जीव शैल, जिनमें सिंहभूम समूह के कायांतरित अवसाद एवं सिंहभूम ग्रेनिट शामिल हैं।

धंजोरी तथा लौह अयस्क वर्ग (I.O.G.) द्रोणी – मध्य आद्यमहाकल्पी से पुरा प्राग्जीव काल के कायांतरित अवसाद।

पूर्वी घाट गतिशील (मोबाईल) पट्टी के शैल जिनमें अधिकांश खोंडालाइट हैं।

 

मध्य से उच्च प्राग्जीव काल के छत्तीसगढ़, गंगपुर, कोलहान और कुंजर द्रोणियों के कायांतरित अवसाद।

प्रायद्वीपीयतर क्षेत्र के शैल सिक्किम हिमालय में।

(iii) गोंडवाना अवसाद - दामोदर, महानदी अनुपाट (रिफ्ट) द्रोणियों में अवस्थित।

(iv) चतुर्थ महाकल्पी (क्वॉटर्नरी) अन्तः स्थलीय एवं पुलिन प्लेसर।

अन्वेषणों का सार: महत्वपूर्ण खोज

स्वतंत्रता पूर्व समय में सिंहभूम क्षेत्र अपनी खनिज संपदा, विशेषकर Cu भंडारों के लिए प्रसिद्ध था । प.ख.नि. की स्थापना के तत्काल बाद इस क्षेत्र में रेडियोमितीय सर्वेक्षणों के परिणामस्वरूप कई स्थानों पर क्लोराइट शिस्ट + एपेटाइट, मैग्नेटाइट क्वॉर्टज़ाइट में आतिथेयित उष्ण जलीय, शिरा-प्रकार (Vein-type) यूरेनियम खनिजीकरण की पहचान की गयी । इनमे से कई आर्थिक रूप से दोहन योग्य भंडारों के रूप में स्थापित हुए। यूरेनियम उपस्थितियां 180 कि.मी. लंबे वृताकार सिंहभूम अपरूपण अंचल में अवस्थित हैं। प्रमुख यूरेनियम निक्षेपों का वर्णन निम्नलिखित है :-

(क) जादूगुड़ा :  पूर्वी सिंहभूम ज़िले के पूर्व में स्थित यह पहला स्थान है, जहां अन्वेषण के उपरान्त अन्वेषणात्मक खनन कार्य प्रारंभ किया गया था । इसके तुरंत बाद 1967 में यू.सी.आइ.एल. द्वारा इस निक्षेप का दोहन प्रारंभ किया गया। खनन वर्तमान में प्रगति पर है तथा 900 मीटर से अधिक लम्बवत गहराई में भी यूरेनियम खनिजीकरण पाया गया है । यहां खनिजीकरण कांग्लोमेरेट तथा प्राग्जीव सिंहभूम वर्ग की क्लोराइट-शिस्ट से संबद्ध है। यूरेनियम तथा कॉपर निक्षेप/उपस्थितियाँ दर्शानेवाला सिंहभूम शियर क्षेत्र का भूवैज्ञानिक मानचित्र

(ख) भाटिन : यह सिंहभूम अपरूपण अंचल में जादूगुड़ा से लगभग 3 कि.मी. पश्चिम में स्थित है । यहां खनिजीकरण क्वॉर्टज़ाइट एवं बायोटाइट क्लोराइट शिस्ट से संबद्ध है। यू.सी.आइ.एल. द्वारा इस निक्षेप का खनन प्रगति पर है।

(ग) नरवापहाड़ : यह सिंहभूम अपरूपण अंचल में जादूगुड़ा से लगभग 10 कि.मी. पश्चिम में स्थित है । यूरेनियम खनिजीकरण क्लोराइट-क्वॉर्ट्ज़ शिस्ट में आतिथेयित है तथा खनिजीकरण 2000 मी. नतिलंब में विस्तारित है। वर्तमान में इस निक्षेप का यू.सी.आइ.एल. द्वारा दोहन किया जा रहा है।

(घ) तुरामडीह : जादूगुड़ा से लगभग 24 कि.मी. पश्चिम में तुरामडीह क्षेत्र में भंडारों का समूह (तुरामडीह पूर्व, तुरामडीह पश्चिम, तुरामडीह-दक्षिण, केरुआडूंगरी) अवस्थित है। यूरेनियम खनिजीकरण क्लोराइट क्वार्ट्ज़ शिस्ट से संबद्ध है। तुरामडीह (पूर्व) में खनिजीकरण 2 कि.मी. X 1 कि.मी. क्षेत्र में विस्तारित है और संपूर्ण संसाधन 200 मी. लंब गहराई में अवस्थित हैं। तुरामडीह पूर्व निक्षेप का खनन यू.सी.आइ.एल द्वारा किया जा रहा है।

(ङ) बन्दुहुरांग : तुरामडीह (पश्चिम) बन्दुहुरांग निक्षेप के रूप में जाना जाता है I इस निक्षेप का यू.सी. आई.एल. द्वारा ‘ओपन कास्ट’ खनन के माध्यम से दोहन किया जा रहा है I

(च) माहुलडीह : यह तुरामडीह से 5 कि.मी. पश्चिम में स्थित है। यहां खनिजीकृत शैल टूर्मलीन-युक्त क्वार्टज़ शिस्ट, क्वार्ट्ज़ाइट और क्लोराइट-क्वार्ट्ज़ शिस्ट हैं। खनिजीकरण 1 कि.मी. नतिलंब में विस्तारित है व 250 मी. लंब गहराई में स्थापित किया गया है । यहाँ यू.सी.आई.एल. द्वारा अप्रैल 2012 से खनन कार्य प्रारंभ किया जा चुका है।

(छ) बागजाता : यह जादूगुड़ा से 25 कि.मी. दक्षिण-पूर्व में स्थित है। क्वार्ट्ज़-क्लोराइट-बायोटाइट शिस्ट में यूरेनियम खनिजीकरण आतिथेयित है। खनिजीकरण 450 मी. नतिलंब एवं 260 मी. लंब गहराई में विस्तारित है। यहाँ यू.सी.आई.एल द्वारा 2008 में खनन प्रारंभ किया जा चुका है यह जादूगुड़ा से 25 कि.मी. दक्षिण-पूर्व में स्थित है। क्वार्ट्ज़-क्लोराइट-बायोटाइट शिस्ट में यूरेनियम खनिजीकरण आतिथेयित है। खनिजीकरण 450 मी. नतिलंब एवं 260 मी. लंब गहराई में विस्तारित है। यहाँ यू.सी.आई.एल द्वारा 2008 में खनन प्रारंभ किया जा चुका है।

सिंहभूम अपरूपण अंचल में इसी प्रकार के भूवैज्ञानिक परिवेश में अन्य छोटे यूरेनियम निक्षेप अवस्थित हैं नामतः (i) बानाडूंगरी-सिंगरीडूंगरी, (ii) कन्यालुका (iii) नीमडीह (iv) गाराडीह एवं (v) राजगांव ।

राखा खदान के कॉपर-अवशेष (टेलिंग) में भी लगभग 100ppm eU308 पाया गया है। इस संसाधन से यूरेनियम-निष्कर्षण हेतु रिकवरी-यूनिट स्थापित की गयी।

यूरेनियम के अतिरिक्त, कन्यालुका में सिंहभूम वर्ग की गार्नेट युक्त बायोटाइट शिस्ट में ज़िनोटाइम (भारी REE युक्त खनिज) के प्रचुर संसाधन पाए गए हैं।

कई स्थानों पर लौह-अयस्क वर्ग (I.O.G) एवं धंजोरी द्रोणियों के तल में क्वार्ट्ज़-पेबल-कांग्लोमरेट प्रकार (Q.P.C.- type) का खनिजीकरण पाया गया है| झारखंड में बुटगोरा, फुलझड़ी, चाकरी तथा ओडिशा में सायम्बा एवं तालडीह ऐसे महत्वपूर्ण स्थल हैं।

अन्वेषणाधीन वर्तमान मुख्य क्षेत्र

पूर्वी क्षेत्र के विभिन्न भागों में यूरेनियम अन्वेषण कार्यक्रम के तहत (i) दक्षिण पुरुलिया अपरूपण अंचल एवं सिंहभूम अपरूपण अंचल में उष्ण जलीय, शिरा प्रकार के यूरेनियम भंडार (ii) मध्य से उच्च प्राग्जीव छत्तीसगढ़ द्रोणी में विषमविन्यास - प्रकार के यूरेनियम भंडार (iii) ओडीशा में देवगढ़- मनकरहछुआँ तथा दैतरी-टोमका द्रोणियों में क्वार्ट्ज़ पेबल कांग्लोमरेट प्रकार के यूरेनियम भंडारों की पहचान पर अधिक महत्व दिया जा रहा है|

सिंहभूम अपरूपण अंचल को देश के यूरेनियम क्षेत्र के रूप में जाना जाता है जहां अनेक यूरेनियम निक्षेप हैं | इन में से कुछ का वर्तमान में यू.सी.आई.एल. द्वारा दोहन किया जा रहा है I नरवापहाड़ – बानाडूंगरी - सिंगरीडूंगरी - गाराडीह वृत्तखंड एवं बांगुरडीह क्षेत्र में अयस्क निकायों के निरूपण तथा निक्षेपों को ज्यामिति, श्रेणी और भण्डार के अनुसार आकलन करने हेतु अन्वेषणात्मक भूवेधन प्रगति पर है |

दक्षिण पुरुलिया अपरूपण अंचल के समानांतर तामर, कंटालडीह, बेलडीह, कुटनी, पोरापहाड़ एवं ठाकुरडूंगरी आदि स्थानों पर संरचनात्मक लक्षणों के निकटस्थ, सिंहभूम समूह एवं छोटा नागपुर ग्रेनिट नाइस कांप्लेक्स में, जलीय एवं भूतत्व यूरेनियम विसंगत क्षेत्र निरुपित किये गए हैं जो विशिष्ट विभंग दिशाओं से संबद्ध हैं| बेलडीह-भवानीपुर एवं कुटनी-डांडुडीह क्षेत्रों में उपसतही अन्वेषण से अल्प खनिजीकरण की पहचान हुई है| चांडिल उपसमूह के अंतर्गत विभिन्न शक्तियों के अनेक EM सुचालकों की पहचान की गयी है जिसमें से कुछ की उपसतही पुष्टि हेतु अन्वेषण किये जा रहे हैं|

झारखण्ड एवं ओडिशा में सिंहभूम क्रेटॉन की भूपर्पटी के ऊपर पुरा प्राग्जीव शैलों में क्वार्ट्ज़ पेबल कांग्लोमरेट प्रकार के यूरेनियम निक्षेपों के लिए अन्वेषण 1980 से निरंतर प्रगति पर है| सर्वप्रथम, 1983 में धंजोरी द्रोणी में इस प्रकार की उपस्थिति ज्ञात हुई | तत्पश्चात, अन्वेषण प्रयासों से सिंहभूम-ओडिशा क्रेटॉन में लौह अयस्क समूह की विभिन्न द्रोणियों नामतः दैतरी-टोमका, कोइरा-नोआमुंडी, बादामपहाड़-गोरुमहिसानी, नोटोपहाड़, मलयगिरि-बंखोल, मनकरहछुआँ एवं देवगढ़ में इस प्रकार की अनेक यूरेनियम उपस्थितियों की पहचान की गयी| यह खनिजीकरण सोना, चांदी एवं प्लैटिनम ग्रुप के तत्वों से संबद्ध है| प्रमुख क्षेत्रों का विवरण निम्नानुसार है:  

क) मनकरहछुआँ क्षेत्र : यह क्षेत्र, पल्लालहरा (ज़िला अंगुल, ओडिशा) के उतर में, सिंहभूम क्रेटॉन की पश्चिमी सीमा के पास स्थित है| यूरेनियम खनिजीकृत क्वार्ट्ज़ पेबल कांग्लोमरेट पर्याप्त नतिलंब विस्तार में असंतत पूर्व में टिमी से लेकर पश्चिम में गुरुसंगा तक पल्लालहरा ग्रेनिट-नाइस के ऊपर विषमविन्यास के साथ-साथ अवस्थित है और मनकरहछुआँ गाँव के आसपास इसके अच्छे अनावरणित अंश देखे जा सकते हैं| यह खनिजीकरण सोना, चांदी एवं प्लैटिनम ग्रुप के तत्वों से संबद्ध है|

ख) बलिया-रंकीया-तलंगी क्षेत्र : यह क्षेत्र सिंहभूम-ओडिशा क्रेटॉन के दक्षिणी भाग में दैतरी-टोमका लौह अयस्क समूह द्रोणी की महागिरी अभिनती में सुकिंडा घाटी, ज़िला जाजपुर, ओडिशा में स्थित है। यूरेनियम खनिजीकृत क्वार्ट्ज़ पेबल कांग्लोमरेट सिंहभूम-ओडिशा क्रेटॉन के आर्कियन ग्रेनिट-ग्रीनस्टोन आधार के ऊपर विषमविन्यास के साथ-साथ महागिरी अभिनती के उत्तरी भाग में कनसा से तलंगी और दक्षिणी भाग में बलिया से काकुड़िया तक अवस्थित है। महागिरी अभिनती के दक्षिणी भाग में भी निम्न श्रेणी यूरेनियम खनिजीकृत क्वार्ट्ज़ पेबल कांग्लोमरेट की पर्याप्त उपसतही नतिलंब निरंतरता स्थापित की गई है।

ग) बिर्तोला-फुलझड़ी पहाड़-बगियाबहाल क्षेत्र : यह क्षेत्र ओडिशा के ज़िला सुंदरगढ़ में बोनाई ग्रेनिटिक कांप्लेक्स की उत्तर-पश्चिमी सीमा में कोइरा-नोआमुंडी लौह अयस्क समूह के तल के समीप स्थित है। यूरेनियम खनिजीकृत क्वार्ट्ज़ पेबल कांग्लोमरेट विभिन्न आयामों के तीन अंतःस्तरीय लेंसरूपी पट्टियों में पर्याप्त नतिलंब विस्तार में अवस्थित है| यूरेनियम खनिजीकरण की स्वर्ण से संबद्धता से अन्वेषण के विषयक्षेत्र को अधिक महत्व मिलता है|

मध्य से उच्च प्राग्जीव छत्तीसगढ़ द्रोणी

मध्य से उच्च प्राग्जीव छत्तीसगढ़ द्रोणी बस्तर क्रेटॉन के उत्तरी सीमा पर स्थित है| द्रोणी का पूर्वी भाग पश्चिमी ओडिशा और पूर्वी छत्तीसगढ़ में स्थित है | पूर्वी छ्त्तीसगढ़ द्रोणी का भौमिकीय और विवर्तनिक ढाँचा विषमविन्यास-प्रकार के यूरेनियम खनिजीकरण की दृष्टि से अनुकूल पाया गया है। इस क्षेत्र में यूरेनियम अन्वेषण सन् 1980 में प्रारंभ किया गया और अब तक बहुधात्विक सल्फाइड से संबद्ध चालीस से अधिक बड़े आकर की यूरेनियम उपस्थितियाँ निरुपित की गयी हैं| यूरेनियम खनिजीकरण संबलपुर ग्रेनिटॉइड और छत्तीसगढ़ आवरण अवसादों के बीच मध्य प्राग्जीव विषमविन्यास के आसपास के क्षेत्र में पाया है। वर्तमान परिदृश्य में सिंगोड़ा प्रोटो द्रोणी यूरेनियम अन्वेषण हेतु मुख्य लक्ष्य क्षेत्र है।

अन्य सुविधाएँ

पूर्वी क्षेत्र में निम्नलिखित प्रयोगशाला सुविधाएँ उपलब्ध है-

 

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